हिन्दी सिर्फ अध्ययन अध्यापन की भाषा तक सीमित नही है और ना ही यह परम्परागत रोजगार का साधन मात्र हैए हिन्दी प्राचीन भारतीय संस्कृति की पहचान है। उक्त बातें गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालयए गांधीनगर के कुलसचिव एवं हिन्दी अध्ययन केन्द्र के अध्यक्ष प्रोण् आलोक कुमार गुप्ता नें बुधवार को डीएवी पीजी काॅलेज के हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आयोजित आॅनलाइन ओरिएंटेशन व्याख्यान को बतौर मुख्यवक्ता सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने हिन्दी भाषा साहित्य के अध्ययन की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी अब पहले से काफी समृद्ध और प्रभावी हो चुकी है। नए दृष्टिकोण में सिनेमाए टेलीविजनए बाजारए प्रबन्धन और विज्ञापन की बड़ी दुनिया में भी हिन्दी की आवश्यकता अनिवार्य हो चुकी है। समाचार पत्र एवं टीवी पत्रकारिता भी हिन्दी के छात्रों के लिए रोजगार का बड़ा साधन है।
अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डाॅण् सत्यदेव सिंह ने कहा कि भाषा साहित्य की समृद्धि पर ही राष्ट्र की समृद्धि निर्भर है। हिन्दी सिर्फ भाषा अथवा साहित्य का स्वरूप नही हैए बल्कि गौरव की अनुभूति कराती है। वर्तमान में हिन्दी का ज्ञान योग्यता की अनिवार्य शर्त है। स्वागत विभागाध्यक्ष डाॅण् राकेश कुमार रामए संचालन डाॅण् समीर कुमार पाठक एवं धन्यवाद ज्ञापन डाॅण् राकेश कुमार द्विवेदी ने दिया। इस अवसर पर मुख्यरूप से डॉ मिश्रीलालए डॉ हबीबुल्लाहए डाॅण् मुकेश कुमार सिंहए डाॅण् अस्मिता तिवारीए प्रताप बहादुर सिंह आदि अध्यापक जुड़े रहे। तकनीकी सहयोग में उज्ज्वल कुमार सिंहए राजन कुमारए विद्या वैभव भारद्

महाविद्यालय में “विश्व मानवता की चुनौतियाँ और कबीर” विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का पहला दिन सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ । महाविद्यालय के परम्पराओं के अनुरूप सेमिनार का उद्घाटन  कुलगीत के साथ हुआ जिसे अंजलि वर्मा ने प्रस्तुत किया । ततपश्चात विषय प्रस्तावना के लिए हमने प्रो• सदानन्द शाही को सुना जिसमें उन्होंने उपभोग की संस्कृति का मनुष्य पर प्रभाव विषयक अपनी चर्चा की शुरुआत की । उन्होंने बताया कि कैसे आज के वर्तमान समय में भूख और सांस की चुनौती हमारे सम्मुख है । वह आगे बताते है कि माया पर कही गई कबीर की बातें उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है । कबीर ईश्वर में आनंद और आनंद में ईश्वर की बातें करते हैं, उक्त बातों के साथ आज के सत्र का विषय प्रस्ताव हमारे सामने उपस्थित किया। जिसके बाद प्रथम वक्ता के रूप में हमारे साथ नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर से हिंदी विभाग की प्रध्यापिका डॉ• सन्ध्या सिंह जी का व्यख्यान हुआ । जिसमें डॉ• सिंह ने कबीर के बारे में कहते हुए बताया कि कबीर महज एक नाम नहीं, परन्तु एक सम्पूर्ण क्रांति का नाम है । कबीर की प्रासंगिकता आज भी उनके लेखन की दिव्यता के आधार पर है । मनुष्य का नकलीपन ही मनुष्यता पर सबसे बड़ा खतरा है, जिसे डॉ• सिंह ने बड़ी ही प्राथमिकता के साथ उल्लेखित किया।

सत्र के दूसरे वक्ता के रूप में आज के इस संगोष्ठी के मुख्य अतिथि ऑस्ट्रेलिया नेशनल यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के प्रध्यापक डॉ• पीटर फ्रीडलैंडर ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत किये । उन्होंने अपने व्याख्यान की शुरुआत कबीर की अस्मिता एवं व्यक्ति की निजी अस्मिता के सम्बंध से की । जहाँ उन्होंने बताया कि कबीर को देखने की सबकी अपनी अपनी दृष्टि है, अपना विचार है, अपने तर्क है । कबीर साहित्य के इतिहास पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने बताया कि आज प्रश्न यह है कि आज हम कबीर को धार्मिक एवं राष्ट्रीय सीमाओं में बांधना चाहते है या उन्हें स्वतंत्र रूप में वैश्विक धरोहर के रूप में देखना चाहते है । उन्होंने बताया कि रबिन्द्रनाथ की पुस्तक “हंड्रेड पोयम्स ऑफ कबीर” के बाद कबीर वैश्विक कवि के रूप में उभरे एवं उनकी रचनाओं का विदेशी भाषा में अनुवाद हुआ ।
उद्घाटन सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो• अवधेश प्रधान सर का बेहद ही सारगर्भित व्याख्यान हुआ । उन्होंने बताया कि कबीर के समस्त पद्यों का जब हम अध्ययन करते है तो देखते है कि उनके यहाँ सबसे ज्यादा ‘सुनो’ शब्द का प्रयोग हुआ है क्योंकि सुनना ही सबसे महत्वपूर्ण है । उन्होंने बताया कि इस वैश्विक महामारी महामारी कोरोना से करुणा ही समस्त मानव जाति को बचा सकती है ।
आज दूसरे सत्र के “कबीर और आज के सवाल” विषयक व्याख्यान में डॉ• वंदना चौबे जी ने बहुत ही सारगर्भित एवं शोधपरक व्याख्यान द्वारा कबीर के समाज में धर्म, समाज एवं श्रमजीवी वर्ग के अंतर के बारे में बताते हुए कबीर के श्रम एवं कबीर के साथ जुड़ी किवदंतियों को ख़ारिज किया। आज के सत्र के अंतिम वक्ता के रूप में प्रो• आशीष त्रिपाठी ने आज के दौर में पूंजीवादी व्यवस्था एवं आज के राजनैतिक हालातों पर चर्चा करते हुए इसपर कबीर की दूरदृष्टि को रेखांकित किया ।प्रो• त्रिपाठी ने बताया कि कैसे इस विषम परिस्थिति में कबीर की सार्थकता एवं प्रमाणिकता उल्लेखनीय है, जबकि पूरा समाज आज दो धड़ों में स्पष्ट रूप से विभाजित दिखलाई पड़ता है ।इस संगोष्ठी के समापन सत्र की शुरुआत सुश्री अंजलि वर्मा के कबीर पद्य गायन से हुआ । ततपश्चात रसांगी नानायक्कार ने कबीर पद्य का गायन किया । इसके समापन सत्र में समाहार वक्तव्य में प्रो मणीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा कि अब पूंजीवाद के पास अब कोई दर्शन नहीं बचा है । यह कोरोना काल विश्व के मानवीय दर्शन के संकट का समय है । उन्होंने बताया कि कबीर धर्म के आंतरिक पक्षों के आलोचक थे । प्रो• ठाकुर ने आगे कहा कि गाँधी का चरखा कबीर का दार्शनिक चरखा है, क्योंकि चरखा चलाते वक्त हम जो आत्ममंथन करते हैं वह हमें खुद से जुड़ने और हमें ऊचां उठने में मदद करता है ।
अंत में अध्यक्षीय भाषण में प्रो• शिवबहादुर सिंह ने कहा कि कबीर का दृष्टिकोण मानवतावादी चिंतन का है, वह शाश्वत प्रेम के प्रतीक है । उनके विचार आज भी प्रासंगिक है । कबीर को किसी काल के सिमा में नहीं बाँधा जा सकता । समापन सत्र का संचालन डॉ• समीर कुमार पाठक ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन का कार्यक्रम डॉ• राकेश कुमार राम ने सपन्न किया ।