Overview
The department of AIHC & Archaeology is one of the cores, reputed and dynamic department since the inception of DAV PG College, Varanasi. Department has a team of young enthusiastic and well qualified faculty members committed to excellence in Academic Research and Professional activities. The department of AIHC & Archaeology was established in 1954 with the approval to begin with Undergraduate (U.G.) Course. At that time department had two permanent faculty members: Dr. Hari Prasad Chaurasiya and Dr. Shankar Prasad. The Department eventually got the approval to run Postgraduate Course in 2014 and allowed to offer PH.D. Supervision in the year 2015. The department believes that college life entails overall development of a student’s personality. Hence we combine class room teaching with excursions to historical sites. We organize National and International Seminars, Workshops, Training Programmes and Special Lectures annually to interrogate the various facets of our discipline. We have a very well established academic environment. Currently the department has seven faculty members headed by Prof. Prasahant Kashyap. Prof. Seema, Dr. Om Prakash Kumar, Dr. Manisha Singh are permanent and Dr. Jyoti Singh and Dr. Kismat Kumari are working as Guest Faculty.
Teachers
Department Information
UG (B.A.)
PG (M.A.)
Ph.D













आज दिनांक 28.09.2024 को महाविद्यालय के पुरानी बिल्डिंग के कांफ्रेंस हॉल के में 11 बजे प्रा.भा.इति.,सं. एवं पुरातत्त्व विभाग के बी.ए. प्रथम सेमेस्टर एवं एम. ए. प्रथम सेमेस्टर के समस्त नवप्रवेशी छात्र-छात्राओं हेतु एक इंडक्शन प्रोग्राम का आयोजन किया
गया | इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मारुतिनंदन प्रसाद तिवारी थे | इन्होंने “भारतीय संस्कृति के स्वर“ विषय पर
अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमे उन्होंने प्राचीन इतिहास के अध्यन में संस्कृति के महत्ता एवं उपयोगिता पर वृहत् प्रकाश डाला
प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग, डी ए वी पी जी कालेज के पुरातत्व के विद्यार्थियों ने भोरकला पुरास्थल पर पुरातात्विक प्रशिक्षण प्राप्त किया ! विभाग के पुराविद डॉ. ओम प्रकाश कुमार
द्वारा प्रशिक्षण में विद्यार्थियों ने भोरकला पर पुरातात्विक सर्वेक्षण, खात निर्धारण, उत्खनन, खात से पुरावशेष संग्रह, साईट नोट बुक लेखन, अनुभाग तैयारी, मृद्भांड अहाता निर्माण एवं अहाता से मृद्भांड पहचान, अनुभाग आरेखन, स्तर निर्धारण एवं कालक्रम निर्धारण आदि बिन्दुओं का प्रशिक्षण प्राप्त किया ! यह प्रशिक्षण विद्यार्थियों के भविष्य के लिए बहुत ही उपयोगी होगा ! भोरकला पुरास्थल वाराणसी में स्थित मिर्जामुराद से लगभग 5 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में स्थित है, यहाँ पर सर्वेक्षण से कृष्ण लोहित मृद्भांड संस्कृति से पूर्व मध्यकाल तक के सांस्कृतिक बसावट का प्रमाण मिला है ! इस पुरास्थान पर पुरातात्विक उत्खनन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग पुराविद प्रो. अनिल कुमार दुबे द्वारा कराया गया था ! इस प्रशिक्षण कार्य के लिए कालेज प्रशासन, कार्यवाहक प्राचार्य प्रोफेसर सत्यगोपाल पाल जी एवं विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रशांत कश्यप एवं विभाग के अन्य सहयोगियों से मिले सहयोग का मैं, ओम प्रकाश,आभारी रहूँगा ! विद्यार्थियों को त्रिविमीय मापन का प्रशिक्षण नहीं दिया जा सका, क्योंकि उत्खनन चल नहीं रहा था !
मातलदेई से लगभग ५ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है ! पुरातात्विक प्रशिक्षण में विद्यार्थियों ने कल दिनांक १२.०९.२३ को महावन पर पुरातात्विक सर्वेक्षण पुरातात्विक छायांकन, खात निर्धारण, खुदाई , खात से पुरावस्तुयों का संग्रह, अनुभाग तैयारी, स्तरों की पहचान एवं निर्धारण, मृद्भांड अहाता से पात्रों की पहचान, कालक्रम निर्धारण, अनुभाग आरेखन, तैराकी के लिए मृदा संग्रह, कोयला का संग्रह, साईट
नोट बुक लेखन, पुरावशेष रजिस्टर आदि बिन्दुयों पर प्रशिक्षण प्राप्त किया गया ! यह प्रशिक्षण विद्यार्थियों के भविष्य के लिए बहुत ही उपयोगी होगा ! पुरातात्विक प्रशिक्षण में कालेज प्रशासन, प्राचार्य प्रोफेसर सत्यगोपाल जी तथा विभागीय सहयोगियों विभागाध्यक्ष प्रोफेसर प्रशांत कश्यप, डा. सीमा, डा. मनिषा सिंह एवं डा. ज्योति सिंह जी से मिले सहयोग के लिए मैं सभी का आभार प्रकट करता हूँ ! उल्लेखनीय है कि वर्त्तमान सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग द्वारा महावन पुरास्थल, वाराणसी, उत्तर प्रदेश में उत्खनन कराया जा रहा है, जिस पर पुरातात्विक उत्खनन पुराविद डा. प्रभाकर उपाध्याय के निर्देशन में चल रहा है!
दक्षिण कोरिया के सियोल नेशनल विश्वविद्यालय दक्षिण कोरिया की पुराविद जेनिफर बेट्स ने हड़प्पा सभ्यता के वनस्पति अवशेष पर प्रकाश डाला, जिसमें उन्होंने बताया कि हड़प्पावासी मौसम के हिसाब से गेहूं, जौ, बाजारा और चावल की खेती करते थे. साथ ही पुरावनस्पति विज्ञान का इस्तेमाल पुरातत्त्व में किस प्रकार करते हैं इसका भी उल्लेख किया।

संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर सुमन जैन जी का सानिध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के कार्यकारी प्राचार्य प्रोफेसर सत्य गोपाल जी ने किया। संचालन डॉ. सीमा , स्वागत वक्तव्य प्रोफेसर प्रशांत कश्यप , धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मनीषा सिंह ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के उप – प्राचार्य प्रोफेसर समीर पाठक की उपस्थिति के साथ साथ अन्य विभागीय एवं महाविद्यालय के सहयोगी डॉ. संजय सिंह , डॉ. ओम प्रकाश कुमार एवं डॉ. ज्योति सिंह , डॉ. विश्रुत द्विवेदी, की भी उपस्थिति रही।
संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर सुमन जैन जी का सानिध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रोफेसर सत्य गोपाल जी ने किया। संचालन
डॉ. सीमा , स्वागत वक्तव्य प्रोफेसर प्रशांत कश्यप , धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मनीषा सिंह ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के उप – प्राचार्य प्रोफेसर समीर पाठक की उपस्थिति के साथ साथ अन्य विभागीय एवं महाविद्यालय के सहयोगी डॉ. संजय सिंह , डॉ. ओम प्रकाश कुमार एवं डॉ. ज्योति सिंह , डॉ. विश्रुत द्विवेदी, की भी उपस्थिति रही।



इस कार्यक्रम का संचालन डा मनीषा सिंह जी द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ मुकेश सिंह जी द्वारा किया गया। इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कश्यप, डॉ सीमा और डॉ ओमप्रकाश कुमार उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में शिक्षकों , शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया एवं कई बिंदुओं पर प्रो जोगलेकर से चर्चा की।
भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी ए वी पी जी कॉलेज द्वारा दिनाँक 12/03/2022 को “भारतीय शैल चित्रकला की झलक” नामक विषय पर विशिष्ट व्याख्यान प्रो. वी एच सोनवने द्वारा दिया गया जिसमें उन्होंने भारतीय शैल चित्रकला पर किये गए अपने विशिष्ट कार्य पर प्रकाश डाला । इस व्याख्यान में उन्होंने बताया कि शैल चित्रकला दक्षिण में केरल से उत्तर में लद्दाख के झन्स्कर घाटी और पश्चिम में गुजरात से पूर्व में मणिपुर तक के विस्तृत क्षेत्र में फ़ैले हुए हैं 1इसमे ब्रुज़िन्ग, एन्ग्रविन्ग और पेंटिंग तकनिकी का इस्तेमाल किया गया है और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है I ये चित्रकला ना केवल चट्टानों पर बल्कि शुतुरमुर्ग के अण्डों पर भी इस प्रकार की चित्रकला प्राप्त होती है, ये चित्रकला निम्न पुराप्रस्तर काल से ऐतिहासिक काल तक प्राप्त हुए हैं, इनसे हमें तत्कालीन समाज की झांकी देखने को मिलती है उद्घाटित किया । इस कार्यक्रम का संचालन डा मुकेश कुमार सिंह द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ ओम प्रकाश कुमार द्वारा किया गया। इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कश्यप, डॉ सीमा और डॉ मनीषा सिंह उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में शिक्षकों , शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया एवं कई बिंदुओं पर प्रो सोनावने जी से चर्चा की।


रूप से संचालित हो रही है।प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी ए वी पी जी कॉलेज द्वारा दिनाँक 24/03/2022 को “क्या जलवायु परिवर्तन सिंधु नगरीकरण के विनाश का कारक था?” नामक विषय पर विशिष्ट व्याख्यान, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, युनाइटेड किंगडम के ख्यातिलब्ध पुरातत्विद डॉ कैमेरान पेट्री द्वारा दिया गया l डॉक्टर कैमेरान पेट्री ने बताया कि वैज्ञानिक अध्ययनों से यह प्रमाणित हो चुका है की 2200 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व के मध्य लगभग दो सौ वर्षों तक मानसून भयंकर रूप से बहुत कम हो गया। जलवायु के अचानक परिवर्तन से हड़प्पा के विभिन्न पुरास्थलों का पतन दिखाई देता है।सैटेलाइट इमेज से यह ज्ञात हुआ है कि इसी समय इस सभ्यता का स्थानांतरण सिंध पाकिस्तान के क्षेत्र से गुजरात, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के क्षेत्रों में हुआ। चर्चा के क्रम में पेट्री ने बताया कि पुरातात्विक स्थलों का संकेद्रण बड़ी नदियों के किनारे न होकर इन नदियों के चैनलों के किनारे था। डॉक्टर पेट्री ने यह निष्कर्ष हरियाणा और राजस्थान के विविध पुरास्थलों जैसे मसूदपुर,लोहारी राघो, डब्ली वास चुगता तथा आलमगीरपुर से प्राप्त किए सैंपल के आधार पर प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम का संचालन डा मनीषा सिंह द्वारा किया गया तथा स्वागत एवं परिचय डा मुकेश कुमार सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ ओम प्रकाश कुमार ने किया। इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कश्यप, डॉ सीमा उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में शिक्षकों , शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया एवं कई बिंदुओं पर कैमेरान पेट्री से चर्चा की












graduate courses cover the prehistoric and proto-historic human past in India, Europe and Africa. The scope of our teaching is global and it covers both theory and practical in archaeology. Students gain essential hands experience from the artefacts housed in the museum of the department during their practical classes. The Museum has a large collection of Prehistoric artefacts that have been collected during archaeological field-work over a long period of time. In the second year (IIIrd semester), PG students of numismatics specialization are involve in numerous practical methods like coin making by plaster of paris etc. They also have to practice conservation and preservation of coins from rusting and patina. They learn about the chemicals used in conservation and preservation of antiquities. Again in the Second year (IVth semester), PG students of archaeology goes through a field training. The students along with their teachers visit the ongoing excavations site to learn the basic pattern of field archaeology. Identification of potteries, antiquities and methods of excavations and explorations are being taught to the students. After returning from the field trip, the students analyze the data and are required to prepare a field report. Pottery drawing is one of the major work conducted in our laboratory, for which we use to invite the experts of this field from other universities too. The students are also engaged in Epigraphy practical in which they learn the basics of Epigraphy. Understanding, identification and writing various scripts like Bramhi, Kharosthi and decipherment is being taught in the laboratory. Further, there are number of researchers pursuing Ph.D. in our department working on different topics in archaeology, numismatics, epigraphy and historiography.
