Teachers

Prof. Vinod Kumar Choudhary
Qualification :M.A., Ph.D.
Designation : Head & Professor
Specialization of Subjects :Modern History
Email :vinodpriti13@gmail.com
Dr. Pratibha Mishra
Qualification : Ph.D.
Designation : Associate Professor
Specialization of Subjects : Modern History
Email :pratibha.misra@gmail.com
Dr. Sanjay Kumar Singh
Qualification :M.A.,PhD
Designation :Associate Professor
Specialization of Subjects :Modern History
Email :snj.dav@gmail.com
Dr. Sobh Nath Pathak
Qualification :M.A.,PhD
Designation :Associate Professor
Specialization of Subjects :Modern Indian History
Email :snpdavpgvns@gmail.com
Dr. Shiv Narayan
Qualification :M.A., Ph.D.
Designation :Assistant Professor
Specialization of Subjects :Modern Indian History
Email :shivhistorybhu@gmail.com
Dr. Shashikant Yadawa
Qualification :M.A.,PhD
Designation :Assistant Professor
Specialization of Subjects :Tribal History
Email :shashisonu45@gmail.con

Department Information

  • UG (B.A.)
  • PG (M.A.)
  • Ph.D
डीएवी पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग के तत्वावधान में सोमवार को आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ‘भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में राष्ट्रवाद का उदय और भूमिका‘ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राजकीय महाविद्यालय, बीएलडब्लू, वाराणसी के डॉ. कमलेश कुमार तिवारी ने कहा कि भारत में राष्ट्रवाद तीन चरणों में रहा है,
सर्वप्रथम राष्ट्रवाद की भावना सन् 1857 की क्रान्ति के दौर में जाग्रृत होती दिखलाई पड़ती है, उसके बाद सन् 1905 से 1947 तक का राष्ट्रवाद रहा जिसमें प्रत्येक भारतीय के दिल में आजादी की ललक ही दिखलाई पड़ी। तीसरा राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य आजादी के बाद का है जिसमंे बदलते परिवेश ने राष्ट्रवाद की धुरी को बदला। भारत के सुधारवादी आन्दोलन के नेता, क्रान्तिकारी नेताओं ने जन जन में राष्ट्रवाद की भावना को गढ़ा है। संचार माध्यमों ने भी राष्ट्रीयता की भावना को दृढ़ किया है। डॉ. कमलेश तिवारी ने यह भी कहा कि आजादी के 75 वर्षो में भारत अपनी उस छवि से मुक्ति की तरफ बढ़ता दिखलाई पड़ रहा है जिसमें भारत माता के स्वरूप को दुनिया के सामने प्रताड़ित और पीड़ित दिखलाया गया है।कार्यक्रम का संयोजन विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार च.ौधरी ने किया। इस अवसर पर विभाग के डॉ. संजय कुमार सिंह, डॉ. शोभनाथ पाठक, डॉ. प्रतिभा मिश्रा, डॉ. शिवनारायण, डॉ. शशिकान्त यादव, डॉ. लक्ष्मीकान्त सिंह आदि सहित विभाग के छात्र-छात्राएॅ ऑनलाइन शामिल रहे।
डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज वाराणसी के इतिहास विभाग द्वारा Life and Thoughts of Bal Gangadhar Tilak विषयक एक दिवसीय नेशनल वेबिनार भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 100 वीं पुण्यतिथि पर उनके आदर्शो, विचारों, जीवन मूल्यों तथा उनके भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान को ध्यान में रख कर 31 जुलाई 2021 ई. को आयोजित किया गया। वेबिनार में मुख्य वक्ता के रूप में लोकमान्य तिलक के प्रपौत्र शैलेष श्रीकांत तिलक ने तिलक के जीवन आदर्शो पर अपनी बात रखते हुए कहा कि आज तिलक के देहावसान के सौ वर्ष बाद भी उनकी राजनीतिक विचारधारा आज भी भारतीय समाज के लिए उतनी ही उपयोगी है जितनी वह अंग्रेजी सरकार के खिलाफ होने वाली लड़ाई के समय थी। तिलक आधुनिक भारत के महानतम कर्मयोगियों में से एक थे, उन्होंने भारतवासियों को स्वराज्य के अधिकार का प्रथम पाठ पढ़ाया था। सर वैलेण्टाइन शिरोल द्वारा तिलक को ‘भारतीय अशान्ति के जनक’ की उपाधि देना उस महान् भूमिका का प्रमाण है जो तिलक ने नवीन राष्ट्रवाद के प्रचार करने में अदा की थी। वेबिनार के विशिष्ट वक्ता वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द गोखले ने कहा कि तिलक स्वराज्य को जन्म सिद्ध अधिकार मानते थे। उनके स्वराज्य प्राप्ति के साधन भी स्वराज्य की धारणा के समान ही शाश्वत सत्य पर आधारित हैं। उनका कहना था कि “स्वराज्य दिया नहीं जाता, बल्कि प्राप्त किया जाता है।” वे उदारवादियों की याचना, प्रार्थना आदि में विश्वास नहीं करते थे। उनका कहना था कि “स्वराज्य आज तक किसी विदेशी सत्ता द्वारा किसी अधीन राज्य को नहीं दिया गया है, इसका गवाह इतिहास है। जितने राष्ट्रों ने स्वराज्य प्राप्त किया है, उन्होंने अपने प्रयत्नों से ही प्राप्त किया है। याचिका की पद्धति को संघर्ष की पद्धति में बदलकर ही किसी राष्ट्र को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। उन्होने बताया की तिलक जाति-पाति और अस्पृश्यता अस्पश्यता में विश्वास नहीं करते थे। उनके अनुसार अस्पृश्यता को किसी भी नैतिक और आध्यात्मिक आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता, अतः इसका अन्त होना चाहिए। उन्होंनें कहा कि काशी उनके लिए श्रद्धास्थल के समान रही और 1906 ई. के राजघाट के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने वह यहॉ आये। इस अवसर पर बोलते हुए और सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व संकायप्रमुख प्रो. रामप्रवेश पाठक ने बोलते हुए कहा की बाल गंगाधर तिलक राष्ट्रीय शिक्षा के द्वारा युवकों को ऐसे शिक्षित करना चाहते थे की उनके अन्दर राष्ट्रीय भावना अधिकाधिक समाये तथा वे राष्ट्र सेवा का कार्य सुगमतापूर्वक कर सकें। तिलक धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को ही पूर्ण न मानकर धार्मिक व आदर्श शिक्षा के भी पक्षधर थे। वे मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहते थे और राजनीति की सफलता के लिए वे शिक्षा को आवश्यक मानते थे। कार्यक्रम में अपनी बात रखते अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रो. मानवेन्द्र पुण्डीर ने कहा की तिलक आधुनिक भारत के निर्माता थे। वे उग्र थे, परन्तु हिंसक नहीं। वे राष्ट्रभक्त एवं देशभक्त थे, परन्तु उदारवादियों की तरह राजनीतिक भिखारी नहीं। उनमें राजनीतिक आदर्शवाद और यथार्थवाद का अद्भुत समन्वय था। उनमें पैनी सूझ-बूझ,विशाल बोद्धिक क्षमता तथा गहन विद्वता थी। कार्यक्रम में बोलते हुए राँची विश्वविद्यालय के प्रो. राजकुमार ने कहा की तिलक पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की प्रधानता को समाप्त कर लोगों को भारत के प्राचीन गौरव का अनुभव कराना चाहते थे। उस समय लोगों पर अँग्रेजी नैतिकता वाली उच्चता की भी छाप थी, तिलक इस अँग्रेजी नैतिक उच्चता के मोहजाल को काटना चाहते थे। अतः वे भारतीय नायकों के जीवन से लोगों को प्रेरणा देना चाहते थे, जो अँग्रेजी चिंतन प्रणाली से मुक्ति प्रदान करने में सहायक हो। कार्यक्रम का अध्यक्षीय सम्बोधन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सत्यदेव सिंह द्वारा किया गया, उन्होने कहा कि तिलक अपने विचारों, कार्यो, सर्मपण और त्याग की भावना से आज अपने देहावसान के सौ साल बाद भी हम सभी के लिए आदरणीय और महत्वपूर्ण हैं। तिलक हम सभी भारत-वासियों के विचारों में जिन्दा है। तिलक महात्मा गांधी से पूर्व ही राष्ट्रीय एकता के लिए प्रयासरत थे और स्वतन्त्रता आंदोलन की लड़ाई के अग्रणी ध्वजवाहक थे। उनके द्वारा शुरू किया गया गणपति पूजन और उनकी पत्रकारिता ने सदैव देश को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया। वेबिनार में  प्रो. बिन्दा परांजपे ने भी तिलक के जीवन दर्शन पर अपने विचार व्यक्त किये। वेबिनार का संयोजन डॉ. विनोद कुमार चौधरी, अध्यक्ष इतिहास विभाग डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज वाराणसी, संचालन डॉ. शोभनाथ पाठक तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजय कुमार सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम में इतिहास विभाग डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज वाराणसी से डॉ. प्रतिभा मिश्रा, डा.शिव नरायन, डा. लक्ष्मीकान्त डा. शशिकांत तथा छात्र – छात्राएं इत्यादि भी उपस्थित रहें।
दिनांक 24 अप्रैल 2022 ई०को इतिहास विभाग डीएवी पी०जी०कालेज में विरासत क्लब के आयोजन के तहत ‘’73 वा संविधान संसोधन और पंचायती राज व्यवस्था’’  विषय पर एकल ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ़ तिब्बतन स्टडीज के स्कूल ऑफ़ सोशल साइंस के अथिति व्याख्याता डॉ. पूर्णिमा त्रिपाठी ने भारत में पंचायती राज व्यवस्था के प्रार्दुभाव पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 1992 ई० में संविधान के 73 वें संविधान संसोधन द्वारा इसे और मजबूती मिली है। इस संशोधन में इसे सुव्यवस्थित एवं कानूनी आधार दिया गया है। जिला परिषद या जिला पंचायत, ये विभिन्न विकास योजनाओं के कार्यान्वयन के सम्बन्ध में सरकार को आवश्यक सलाह भी देती है। इसमें महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के विशेष प्रतिनिधित्व का प्रावधान है। डॉ॰पूर्णिमा त्रिपाठी ने बताया कि भारत में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय सरकार की मुख्य धुरी के रूप के रूप में कार्य करती है। भारत में पंचायती राज व्यवस्था ही राज्य और केंद्र सरकार की विकास योजनाओं को संचालित करने में अपनी मुख्य भूमिका निभा रही है। अतः योग्य प्रतिनिधि का चुनाव करना हम सभी का मुख्य दायित्व होना चाहिए, इससे देश में पंचायती राज व्यवस्था को और अच्छी गति मिल सके।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ॰सत्यदेव सिंह ने किया। कार्यक्रम का संयोजन डॉ॰ प्रतिभा मिश्रा ने किया, स्वागत डॉ॰लक्ष्मी कांत सिंह, एवं धन्यवाद ज्ञापन विरासत क्लब के समन्वयक डॉ॰  शोभनाथ पाठक के द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विभाग के डॉ॰प्रतिभा मिश्र, डॉ॰संजय कुमार सिंह, डॉ॰शिव नारायण, डॉ॰ शशिकान्त, उपस्थित थे। इसके साथ ही मुख्य रूप से प्रोफेसर मधु सिसोदिया, डॉ॰ सुषमा मिश्रा, डॉ॰हसन बानो, डॉ॰प्रतिमा गोंड सहित विभाग के छात्र – छात्राओं ने इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये l
दिनांक 8 अप्रैल 2021 ईo को इतिहास विभाग डीएवी पी०जी०कालेज में विरासत कल्ब के आयोजन के तहत “आपदा एवं महामारी: एक ऐतिहासिक पुनर्वलोकन” विषय पर एकल आनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर इतिहास विभाग कि डॉ० प्रतिभा मिश्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि भारतीय समाज ने बीते इतिहास में कई महामारियों का सामना किया है। महामारी ज्यादातर बीमारियों के प्रकोप में आने से होती हैं, जो मानव से मानव संक्रमण के प्रसार के परिणामस्वरूप व्यापक हो जाती है। मानव इतिहास में कई महत्वपूर्ण महामारी दर्ज की गई हैं। इनमें चेचक, हैजा, प्लेग, डेंगू, इन्फ्लूएंजा, गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम (SARS) और तपेदिक शामिल हैं। इन्फ्लुएंजा महामारी अप्रत्याशित लेकिन आवर्ती घटनाएं है। इसके पूरी दुनिया के समाज पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हर महामारी ने मानव जीवन को नुकसान पहुचाया हैं।
समाज के आर्थिक विकास को प्रमुख रूप से प्रभावित किया हैं। हाल के वर्षों में कई बीमारियों के पैमाने पर प्रकोप देखे गए हैं l जैसे- हंता वायरस, पल्मोनरी सिंड्रोम, गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम, H5NI इन्फ्लूएंजा, HINI, मध्य पूर्व श्वसन सिंड्रोम और इबोला वायरस रोग महामारी। वर्तमान में हम COVID-19 महामारी का सामना कर रहे हैं जिसे 21″सदी का पहला बड़ा संकट माना जा सकता है यह पूरी दुनिया को तीव्रता से प्रभावित कर रहा है। कोरोना वायरस महामारी के कारण पिछले महामारियों में समाज विज्ञान के लोगो की काफी रूचि बढ़ गई है और विद्वानो द्वारा इस लगातार वर्तमान महामारी की तुलना पिछले ऐतिहासिक महामारियों से करने की कोशिश की जा रही है।
इस आनलाइन व्याख्यान कार्यक्रम की अध्यक्षता महविद्यालय के प्राचार्य डॉ०सत्यदेव सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन विरासत क्लब के समन्वयक डॉ० शोभनाथ पाठक द्वारा किया गया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ० शिवनारायण ने किया। कार्यक्रम में विभाग के सभी शिक्षक गण डा. विनोद कुमार चौधरी, डा. संजय कुमार सिंह, डा. लक्ष्मीकान्त सिंह उपस्थित थे। इसके साथ ही कार्यक्रम में विभाग के छात्र –छात्राओं ने भी इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये।
दिनांक 25 अगस्त 2020 ई०को इतिहास विभाग डीएवी पी०जी० कालेज में स्टूडेंट क्लब विरासत के तत्वाधान में आयोजित आनलाइन व्याख्यान आयोजन के तहत ‘’भारत में संसदीय प्रजातंत्र की उपादेयता’’ विषय पर एकल व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभाग के अध्यक्ष डॉ०विनोद कुमार चौधरी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया कि भारत में संसदीय प्रजातंत्र की उपादेयता के संदर्भ में  निम्न बिन्दुओं को महत्वपूर्ण माना जा सकता है ।भारत में संसदीय प्रजातंत्र की उपादेयता_history
  1. संसद में चुनाव के माध्यम से प्रतिनिधित्व इसलिए तय किया जाता है की प्रतिनिधित्व में सामाजिक और सांस्कृतिक-विविधिता अधिक हो।
  2. संसदीय-प्रजातंत्र इसलिए भी आवश्यक और महत्वपूर्ण होता है कि संसदीय प्रजातंत्र में कार्यपालिका संसद के प्रति उतरदायी होती है। चूंकि कार्यपालिका की शक्तियां एक व्यक्ति के हाथ में निहित होती है, अतः उसे उतरदायी नहीं बनाया जायेगा तो निरंकुशता बढ़ने की संभावना बनी रहती है। अतः यह जरूरी है की उसे उत्तरदायी बनाया जाये।
  3. संसदीय-प्रजातंत्र के लिए संविधानवाद  आवश्यक है ।
  4. संसदीय-प्रजातंत्र में असहमति व्यक्त करने का अधिकार सभी को प्राप्त होता है, भारत जैसे देश में जहां बहुत से धर्मं,संस्कृति,भाषा इत्यादि के लोग रहते है, वहां असहमति की सम्भावना अधिक होती है। यदि उन असहमतियों को दबाने की कोशिश की जाएगी तो वह संसदीय-प्रजातंत्र बेहतर विकास के मॉडल के साथ नहीं जुड़ पाएगा। अतः स्पष्ट है भारत में संसदीय प्रजातंत्र बरक़रार रहे और उसके संस्थाओ को सुरक्षित रखा जाये।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ०सत्यदेव सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन, विरासत क्लब के समन्वयक डॉ० शोभनाथ पाठक द्वारा किया गया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ०शिवनारायण ने किया। इस कार्यक्रम में विभाग के प्राध्यापक डॉ०प्रतिभा मिश्र, डॉ०संजय कुमार सिंह, डॉ०लक्ष्मीकान्त सिंह भी उपस्थित थे। इसके साथ ही कार्यक्रम में विभाग के छात्र -छात्राओं ने भी विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये।
दिनांक 18 सितम्बर 2019 ई०को इतिहास विभाग डीएवी पी०जी०कालेज में विरासत क्लब के आयोजन के तहत ‘’समसामयिक विश्व राजनीति में भारत की भूमिका’’ विषय पर एकल व्याख्यान का आयोजन किया गया। समसामयिक विश्व राजनीति और भारत की भूमिका_historyइस अवसर पर इतिहास विभाग के प्राध्यापक डॉ०शिव नारायण ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि समसामयिक वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका के निमित्त लोगों को आपदा में अवसर तलाशने की जरूरत है। उन्होने माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा आर्थिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वाले आवाहन का उल्लेख किया। उन्होने कहा यह कदम वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण रूप में रेखांकित करेगा। 1990 ई०से लेकर अब तक 6.5 प्रतिशत की उल्लेखनीय औसत वृद्धि दर बनाये रखने के कारण भारत के सतत विकास की गति जापान, जर्मनी और रूस जैसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों से आगे बढ़ रही है। 2018 ई० में  $10.5 बिलियन डॉलर की GDP (PPP) के साथ भारत की अर्थव्यवस्था अब चीन और अमरीका के बाद विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। अनेक दीर्घकालीन परियोजनाओं को लागू करने के बाद से अगले बीस वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी और भारत विश्वगुरू बन सकता है। इस आयोजन की अध्यक्षता विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ०विनोद कुमार चौधरी ने किया। कार्यक्रम का संचालन, विरासत क्लब के समन्वयक डॉ०शोभनाथ पाठक द्वारा किया गया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ०अतुल प्रताप सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विभाग के प्राध्यापक डा०प्रतिभा मिश्र, डा०संजय कुमार सिंह, डॉ०लक्ष्मीकान्त सिंह भी उपस्थित थे। कार्यक्रम में विभाग के छात्र–छात्राओं ने भी इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये।
दिनांक 19 सितम्बर 2018 ई०को इतिहास विभाग डीएवी पी०जी०कालेज में विरासत क्लब के आयोजन के तहत  “मेक इन इंडिया”  विषय पर एकल व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस विषय पर छात्रों को इतिहास विभाग की प्राध्यापिका डा.प्रतिभा मिश्र द्वारा सम्बोधित किया गया। उन्होने अपने सम्बोधन में कहा की निर्माण को बढ़ावा देने एवं उसके संवर्धन के लिए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितम्बर 2014 को “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम की शुरुआत की जिससे भारत को महत्वपूर्ण निवेश एवं निर्माण, संरचना तथा अभिनव प्रयोगों के वैश्विक केंद्र के रुप में बदला जा सके।
मेक इन इंडिया का मकसद देश को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाना है। इसमें घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों को मूल रूप से एक अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने का वायदा किया गया है ताकि 125 करोड़ की आबादी वाले मजबूत भारत को एक विनिर्माण केंद्र के रूप में परिवर्तित करके रोजगार के अवसर पैदा हों। इससे एक गंभीर व्‍यापार में व्‍यापक प्रभाव पड़ेगा और इसमें किसी नवाचार के लिए आवश्‍यक दो निहित तत्‍वों– नये मार्ग या अवसरों का दोहन और सही संतुलन रखने के लिए चुनौतियों का सामना करना शामिल हैं। राजनीतिक नेतृत्‍व के व्‍यापक रूप से लोकप्रिय होने की उम्‍मीद है। इसके साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ पहल वास्‍तव में आर्थिक विवेक, प्रशासनिक सुधार के न्‍यायसंगत मिश्रण के रूप में देखी जाती है। इस प्रकार यह पहल जनता जनादेश के आह्वान- ‘एक आकांक्षी भारत’ का समर्थन करती है।
उन्होने बताया की इसके माध्यम से सरकार भारत में अधिक पूँजी और तकनीकी निवेश पाना चाहती है। इस परियोजना के शुरू होने के बाद से सरकार ने कई क्षेत्रों में लगी FDI (Foreign Direct Investment) की सीमा को बढ़ा दिया है, लेकिन सामरिक महत्व के क्षेत्रों जैसे अंतरिक्ष में 74% ,रक्षा-49% और न्यूज मीडिया 26% को अभी भी पूरी तरह से विदेशी निवेश के लिए नही खोला गया है। वर्तमान में, चाय बागान में एफडीआई के लिए कोई प्रतिबन्ध नहीं है।  उन्होने छात्रों से आवाहन किया की सभी मिल कर सरकार की इस नीति को आम जनमानस में ले जाए, जिससे सभी वर्ग समुदाय के लोग इसके विषय में जान सके और इससे जुड़ कर इसका लाभ प्राप्त कर सकें।
 इस व्याख्यान कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ॰सत्यदेव सिंह ने किया। कार्यक्रम में स्वागत डॉ॰ अतुल प्रताप सिंह के द्वारा किया गया। धन्यवाद ज्ञापन विरासत क्लब के समन्वयक डॉ॰ शोभनाथ पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विभाग के विभागाध्यक्ष डा.विनोद कुमार चौधरी, प्राध्यापक डॉ॰संजय कुमार सिंह, डॉ॰शिव नारायण उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में विभाग के छात्र – छात्राओं ने इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये और प्राध्यापकों द्वारा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया गया