संस्कृत विभाग के तत्वावधान में बंगलूरु कर्नाटक से आयी  सावित्री राव एवं  उनकी सहयोगिनी विदुषियों ने श्री शंकरभगवतपाद विरचिता सौंदर्य लहरी का महाविद्यालय में संस्कृत भाषा एवं अन्य  जिज्ञासु छात्रों को सस्वर पाठ करवाया एवं  स्त्रोत पाठ हेतु हम सभी को 27 मार्च 2022  का आमंत्रण भी दिया, और भगवान श्री शंकराचार्य जी के भव्य स्वरूप को भेंट किया |  श्रृंगेरी मठ की ओर से संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में 27 मार्च को आयोजित सौंदर्य लहरी स्तोत्र पाठ में पीएम मोदी भी शामिल होंने की संभावना है| राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शीर्ष संघचालक मोहन भागवत भी जनआस्था से जुड़े आयोजन में शामिल होंगे। इस खास अनुष्ठान में देश भर से दस हजार से अधिक साधु-संत, बटुक व वैदिक ब्राह्मण जुट रहे हैं।
दयानन्दस्नातकोत्तर महाविùालयस्य संस्कृतविभाग पक्षतः विंशत्यधिकद्विसहस्त्रतमे वर्षे (2020)मई मासस्य एकादश दिनांकतः विंशतिदिनांकं ( 11दृ20 ) यावत् एका विशिष्टा वेविनार कार्यशाला आयोजिता। कार्यशालायां जीवने संस्कृतस्योपादेयता विषयोपरि वक्तारः स्व स्व व्याख्यानं अयच्छछन्।

डॉ. डी.पी. सिंह, अध्यक्ष, यू.जी.सी.

तस्मिन कार्यक्रमे प्रथमदिवसे मुख्यातिथयः सोमनाथसंस्कृतविश्वविùालस्य कुलपतयः प्रोÛ गोपबन्धु महोदयाः यन्नेहास्ति न तत्क्वचिदित्युत्वा अस्याः सौष्ठवं उक्तवन्तः यत् इमां भाषां विना विश्वमान्यां वेदोपनिषदां गीतादिग्रन्थानां च मौलिकं स्वाध्यायं कर्तुं प्रभवामो येषां संसारस्य सर्वेष्वपि सभ्यदेशेषु सुमहान प्रचारः समादरश्च वर्तते भारतीयत्वस्य हिन्दुत्वस्य वा ज्ञानाय तु सर्वतः पूर्वं संस्कृताध्ययनं नित्तान्तमेवावश्यकं वर्तते। अस्माकं भेषभूषा आचारव्यवहाररीतयोनीतयश्च भारतीयसंस्कृतेः अनुरूपाः स्युः तथा आचरणीयम् इति।
तत्रैव विशिष्टातिथयः काशीहिन्दूविश्वविùालयस्य कलासंकायस्य संस्कृतविभागस्य अध्यक्षाः प्रोÛ उमेशसिंह महोदयाः नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विùते। इत्यधिकृत्य सर्वं ज्ञानं संस्कृताधीनं तच्च संस्कृतभाषां विना नोपलभ्यते।यतः संस्कृतभाषा विश्वस्य सर्वासु भाषाासु प्राचीनतमा सर्वाेत्तमसाहित्यसंयुक्ता संस्कृतभाषाया उपयोगिता एतस्मात् कारणाद् वर्तते एषैव सा भाषाऽस्ति । सस्कृतभाषैव भारतस्य प्राणभूता भाषास्ति। एषैव समस्तं भारतवर्षमेकसूत्रे बध्नाति। भारतीयगौरवस्य रक्षणाय एतस्याः प्रचारः प्रसारश्च सर्वैरेव कर्तव्यः।

प्रो गोपबंधु मिश्रा

मुख्यातिथयः विश्वविùालयानुदानायोगस्य अध्यक्षाः प्रोÛ धीरेन्द्रपाल सिंह महोदयाः संस्कृते सकला कला इति उक्त्वा संस्कृत भाषायाः का आवश्यकता एवं च किदृशी भाषास्ति अस्याः किं प्रयोजनम् अन्यान्य वैशिष्ट्यं दत्वा अस्या भाषायाः गौरवं प्रोक्तवन्तः तथा च उक्तवन्तः यùपि भूमण्डलस्य विभिन्नासु संस्कृतग्रन्थानाम् अनेके अनुवादाः प्रकाशिताः सन्ति तथापि यथामूलग्रन्थानाम् अध्ययने इति सर्वसम्मतः सिध्दान्तः अस्ति। यथार्थज्ञान तु दूरे तिष्ठतु अनुवादकानां वुध्दिभेदात् विचारभेदात् अज्ञानात् अर्थपरिवर्तनाद्वा पदे पदे भ्रान्तिरेव जायते।
तत्रैव विशिष्टातिथयः काशीहिन्दूविश्वविùालयस्य संस्कृतविùाधर्मविज्ञान संकायस्य अध्यक्षचराः प्रोÛ बालशास्त्रि महोदयाः समस्ताकृतिः संस्कृतं संस्कृतेन विना संस्कृतं भारतं भारतन्न इत्युक्त्वा विषयस्य महिमानं वर्णितवन्तः।
तै उक्तं संस्कृतशिक्षा नकेवलं सास्कृतिकैतिहासिकपरम्परागतादिविषयानेव बोधयति अपितु संस्कारप्रदानपुरस्सरं जनानां चरित्रनिर्माणोऽपि साहाय्यं करोति। नीतिशास्त्रधर्मशास्त्रश्रीमद्भगवद्गीताप्रभितिषु संस्कृतग्रन्थेषु प्रतिपदं नैतिकतायाः शिक्षणं क्रियते। संस्कृतभाषा वैज्ञानिकी भाषाऽपि वर्तते।भाषायां प्रवाहरूपेण शोधकार्यं भवति वेदानां कथनमधिकृत्य वैज्ञानिकाः नवीनयन्त्राणां निर्माणं कुर्वन्ति। तत्रोपस्थिताः अन्येऽपि विद्वान्सः प्रोÛ ब्रजभूषण ओझा वर्याः प्रोÛ यामिनीभूषणाः प्रोÛ ताराशंकरशर्म महाभागाः विषयोपरि स्वं स्वं विशिष्टं व्याख्यानं प्रस्तुतवन्तः।
शास्त्रचतुष्टयी विशिष्ट व्याख्यानमाला का शुभारम्भ वाराणसी डी.ए.वी.पी.जी. कालेज के संस्कृत विभाग के तŸवावधान में व्याकरण, दर्शन एवं साहित्य विषय पर 15 दिवसीय शास्त्रचतुष्टयी विशिष्ट व्याख्यान माला का विशिष्ट प्रयोजन न्ळब् नेट प्रतियोगिता को मद्दे नजर रखते हुए इस व्याख्यान माला का शुभारम्भ हुआ। पहले दिन कलकŸाा विश्वविद्यालय के एसोसिएट डॉ0 नीरज भार्गव ने कारक, समास विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि संस्कृत साहित्य में जब तक व्याकरण को नहीं समझ पाएगें संस्कृत समझना कठिन हैं उन्होेंने कहा कि संस्कृत न केवल ऋषियों की वाणी हैं अपितु यह सृष्टि का आधार हैं और यह अनादि काल की भाषा हैं। अगले दिन शासकीय संस्कृत महाविद्यालय देवेन्द्रनगर पन्ना मध्य प्रदेश के डॉ0 नीरज शर्मा ने संधि तद्धित, स्त्री प्रत्यय-विषय पर महŸवपूर्ण तथ्यों से प्रतिभागियांे को अवगत कराये। वहीं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ0 मनीष शर्मा ने लघु-सिद्धान्त कौमुदी, कृदन्त, स्त्री, प्रत्यय एवं महाभाष्य पस्पशाह्मिक विषय पर व्याख्यांन देते हुए कहा है कि व्याकरण उतना भी कठिन नहीं हैं। जितना लोग कहते हैं व्याकरण निरन्तर अध्ययन-अध्यापन करने से विषय सरल हो जाते हैं। इसी क्रम में धर्मशास्त्र मीमांसा विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संस्कृत विद्याधर्म विज्ञान संकाय, मीमांसा मर्मज्ञ प्रो0 जनार्दन रटाटे ने अर्थसंग्रह-धर्म, भावना, विधि, अर्थवाद विषय पर अपना विचार व्यक्त किये। इसके अलावा वेद विभागाध्यक्ष सनातन धर्म आदर्श संस्कृत महाविद्यालय डोहरी जिला ऊना हिमाचल प्रदेश के डॉ0 कृष्ण मोहन पाण्डेय ने प्रतिभागियों को संस्कृत वाबमय में प्रतिपादित रससिद्धान्त विषय पर छात्रों को व्याख्यान दिये। वहीं साहित्य पर संस्कृत विभाग डी.ए.वी.पी.जी. कालेज देहरादून, उŸाराखण्ड के डॉ0 रामविनय सिंह ने संस्कृत वाबमय में प्रतिपादित ध्वनि-तŸव पर व्याख्यान देते हुए इस सिद्धान्त व आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा प्रतिपादित ध्वनिवाद के गुढ़ रहस्यों से प्रतिभागियों को अवगत कराये। कार्यक्रम के संयोजक विभागाध्यक्ष डॉ0 मिश्रीलाल नेस्वागत एवं डॉ0 पूनम सिंह ने संचालन किया। इस अवसर पर डॉ0 रविकान्त त्रिपाठी, डॉ0 सुषमा जायसवाल डॉ0 चन्द्रकला सिंह एवं छात्रगण, अन्य विद्यालयों से भी बड़ी संख्या में अध्यापक- अध्यापिका, शोधच्छात्र, परास्नातक, स्नातक के विद्यार्थी जुड़े रहे। इस शास्त्रचतुष्टयी विशिष्ट व्याख्यानमाला का मुख्य उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए विद्यार्थियों को तैयार करना हैं, व्याख्यानमाला में किस विषय को कैसे पढ़े कितना पढ़े, इस सम्बन्ध में जानकारी भी दी गई। इस कार्यक्रम के संचालन कर्Ÿाा से कहा कि वर्तमान में प्रतियोगी परीक्षाओं में जटिल व गहन अवधारणाओं से सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं छात्रों के भावी जीवन व कठिन विषयों के लिए कैसे तैयार करें। छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए विषय-वस्तु को रूचिकर कैसे बनाया जाए इस पर श्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण किया गया और विषय विशेषज्ञांे के दृष्टिकोण और वास्तविक जीवन की प्रेरणाएँ आदि शामिल किया गया जिसमें विषय विशेषज्ञांे के द्वारा विद्यार्थियों के विभिन्न जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। भारतवर्ष में 70ः जनसंख्या युवाओं की हैं, किन्तु आज का शिक्षित युवक अपनी प्राचीन संस्कृत विषय ज्ञान-विज्ञान व उपलब्धियों से अनभिज्ञ है उसमें साहस व आत्मविश्वास की कमी हैैं। आज के वैज्ञानिक और तकनीकी युग में भारतीय संस्कृत शास्त्रों को मजबूत बनाया जाए।
इस दृष्टि से प्रयास हैं कि उच्च शिक्षित युवा वर्ग एवं युवा अध्यापक, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, विद्यार्थी इत्यादि व्याख्यानमाला के सम्पर्क में आए, इस विचारधारा को समझे एवं इससे जुड़े। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए डी.ए.वी.पी.जी. कालेज में शास्त्रचतुष्टयी विशिष्ट व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया इस शास्त्रचतुष्टयी व्याख्यानमाला का मुख्य उद्देश्य संस्कृत साहित्य और भारतीय संस्कृति के मुख्य आयामों से तथा संस्कृत के क्षेत्र में हो रहे निरन्तर नए शोध से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षको को परिचित करवाया जाए और सभी भारतीय भाषाओं के लिए संस्कृत ही अन्तः प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज भी इन भाषाओं का पोषण और संवर्धन संस्कृत द्वारा होता है। संस्कृत की सहायता से कोई भी उŸार भारतीय व्यक्ति तेलगू, कन्नड़, उड़िया, मलयालम आदि दक्षिण एवं पूर्ण भारतीय भाषाओं को सरलतापूर्वक सीख सकता हैं, भारतीय संस्कृति की सुरक्षा, चरित्रवान नागरिकों के निर्माण, सद्भावनाओं के प्रसार प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति, मौलिक चिन्तन की प्रेरणा एवं विश्व शान्ति हेतु संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन अवश्य होना चाहिए।
दिनांक 20/10/2016 को डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित ‘संस्करात्मकर्मकांडेन सह ज्योतिष-वास्तु कौशल विकास कार्यशाला’ विषयक कार्य शाला का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि प्रोफेसर यदुनाथ दुबे, कुलपति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि ज्योतिष कर्मकांड एवं वास्तु कौशल भारतीय सभ्यता के उन्नति के द्योतक है और हमारी सांस्कृतिक विकास यात्रा को प्रतिबिंबित करते है l वर्तमान समय में इन सब की प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिये l
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर श्री किशोर मिश्र , पूर्व विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति के बीच कर्मकांड और वास्तु कौशल की ज्ञान परंपरा का मेल आवश्यक है ताकि पारंपरिक विद्या के द्वारा हम आधुनिक उन्नति को सतत उन्नतिशील बना सकते है l
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में सारस्वत अतिथि के रूप में पूर्व कुलपति, श्री जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी, उड़ीसा प्रोफेसर गंगाधर पंडा ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय परंपरा में उन्नति के साथ शुभाशुभ का विचार सदैव हावी रहा है इसलिए अतीत की प्राचीन विद्या द्वारा ही कला की नई परंपरा का निर्माण हो सकता है l
इस दस दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो० सत्यदेव सिंह ने कहा कि ज्योतिष कर्मकांड एवं वास्तुशास्त्र जैसे भारत विद्या के प्राचीन स्रोतों को आधुनिक ज्ञान परम्परा में शामिल करके उसका अधिकाधिक रचनात्मक उपयोग इसलिए आवश्यक है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी प्राचीन परंपरा से कटती जा रही है और तरह-तरह की भ्रांतियों की शिकार है l उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य वर्तमान समय में भारत विद्या के महत्व को स्थापित करना है l
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में डॉ पूनम सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर संस्कृत विभाग और संयोजक ने आधार वक्तव्य में भारत विद्या के महत्व को स्थापित किया और विभागाध्यक्ष डॉ. लल्लन प्रसाद जायसवाल ने स्वागत वक्तव्य दिया l इस सत्र का सञ्चालन डॉ मिश्री लाल एसोसिएट प्रोफेसर संस्कृत विभाग ने किया और धन्यवाद् प्रकाश नालंदा विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी सदस्या डॉ माधवी तिवारी ने किया l इस अवसर पर सभी विभागों के विभागाध्यक्ष सहित उपाचार्य डॉ अवधेश मिश्र, डॉ शिव बहादुर सिंह , डॉ प्रदीप सेन , डॉ विक्रमादित्य राय, डॉ हरिश्चंद्र यादव, डॉ सत्यगोपाल,डॉ ऋचा यादव,डॉ सर्वेश सिंह, डॉ राकेश दिवेदी , डॉ राकेश राम , डॉ कल्पना सिंह,डॉ मीनू लकड़ा,डॉ अखिलेश दूबे, डॉ मुकेश कुमार सिंह,डॉ शैलजा, डॉ अखिलेन्द्र,डॉ कमालुद्दीन शेख,डॉ समीर पाठक,डॉ हबीबुल्लाह,डॉ सतीश सिंह,डॉ संगीता जैन,डॉ प्रशांत कश्यप, धम्मरतन, शुधान्शु, अंशु यादव,मनीष यादव, सुजीत मौर्या सहित भारी संख्या में छात्र –छात्राएँ उपस्थित थे l
इस दस दिवसीय कार्यशाला में ज्योतिष , कर्मकांड और वास्तु के विभिन्न आयामों पर प्रत्येक दिन विभिन्न विद्वानों द्वारा चर्चा की जाएगी l