दयानन्दस्नातकोत्तर महाविùालयस्य संस्कृतविभाग पक्षतः विंशत्यधिकद्विसहस्त्रतमे वर्षे (2020)मई मासस्य एकादश दिनांकतः विंशतिदिनांकं ( 11दृ20 ) यावत् एका विशिष्टा वेविनार कार्यशाला आयोजिता। कार्यशालायां जीवने संस्कृतस्योपादेयता विषयोपरि वक्तारः स्व स्व व्याख्यानं अयच्छछन्।

डॉ. डी.पी. सिंह, अध्यक्ष, यू.जी.सी.

तस्मिन कार्यक्रमे प्रथमदिवसे मुख्यातिथयः सोमनाथसंस्कृतविश्वविùालस्य कुलपतयः प्रोÛ गोपबन्धु महोदयाः यन्नेहास्ति न तत्क्वचिदित्युत्वा अस्याः सौष्ठवं उक्तवन्तः यत् इमां भाषां विना विश्वमान्यां वेदोपनिषदां गीतादिग्रन्थानां च मौलिकं स्वाध्यायं कर्तुं प्रभवामो येषां संसारस्य सर्वेष्वपि सभ्यदेशेषु सुमहान प्रचारः समादरश्च वर्तते भारतीयत्वस्य हिन्दुत्वस्य वा ज्ञानाय तु सर्वतः पूर्वं संस्कृताध्ययनं नित्तान्तमेवावश्यकं वर्तते। अस्माकं भेषभूषा आचारव्यवहाररीतयोनीतयश्च भारतीयसंस्कृतेः अनुरूपाः स्युः तथा आचरणीयम् इति।
तत्रैव विशिष्टातिथयः काशीहिन्दूविश्वविùालयस्य कलासंकायस्य संस्कृतविभागस्य अध्यक्षाः प्रोÛ उमेशसिंह महोदयाः नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विùते। इत्यधिकृत्य सर्वं ज्ञानं संस्कृताधीनं तच्च संस्कृतभाषां विना नोपलभ्यते।यतः संस्कृतभाषा विश्वस्य सर्वासु भाषाासु प्राचीनतमा सर्वाेत्तमसाहित्यसंयुक्ता संस्कृतभाषाया उपयोगिता एतस्मात् कारणाद् वर्तते एषैव सा भाषाऽस्ति । सस्कृतभाषैव भारतस्य प्राणभूता भाषास्ति। एषैव समस्तं भारतवर्षमेकसूत्रे बध्नाति। भारतीयगौरवस्य रक्षणाय एतस्याः प्रचारः प्रसारश्च सर्वैरेव कर्तव्यः।

प्रो गोपबंधु मिश्रा

मुख्यातिथयः विश्वविùालयानुदानायोगस्य अध्यक्षाः प्रोÛ धीरेन्द्रपाल सिंह महोदयाः संस्कृते सकला कला इति उक्त्वा संस्कृत भाषायाः का आवश्यकता एवं च किदृशी भाषास्ति अस्याः किं प्रयोजनम् अन्यान्य वैशिष्ट्यं दत्वा अस्या भाषायाः गौरवं प्रोक्तवन्तः तथा च उक्तवन्तः यùपि भूमण्डलस्य विभिन्नासु संस्कृतग्रन्थानाम् अनेके अनुवादाः प्रकाशिताः सन्ति तथापि यथामूलग्रन्थानाम् अध्ययने इति सर्वसम्मतः सिध्दान्तः अस्ति। यथार्थज्ञान तु दूरे तिष्ठतु अनुवादकानां वुध्दिभेदात् विचारभेदात् अज्ञानात् अर्थपरिवर्तनाद्वा पदे पदे भ्रान्तिरेव जायते।
तत्रैव विशिष्टातिथयः काशीहिन्दूविश्वविùालयस्य संस्कृतविùाधर्मविज्ञान संकायस्य अध्यक्षचराः प्रोÛ बालशास्त्रि महोदयाः समस्ताकृतिः संस्कृतं संस्कृतेन विना संस्कृतं भारतं भारतन्न इत्युक्त्वा विषयस्य महिमानं वर्णितवन्तः।
तै उक्तं संस्कृतशिक्षा नकेवलं सास्कृतिकैतिहासिकपरम्परागतादिविषयानेव बोधयति अपितु संस्कारप्रदानपुरस्सरं जनानां चरित्रनिर्माणोऽपि साहाय्यं करोति। नीतिशास्त्रधर्मशास्त्रश्रीमद्भगवद्गीताप्रभितिषु संस्कृतग्रन्थेषु प्रतिपदं नैतिकतायाः शिक्षणं क्रियते। संस्कृतभाषा वैज्ञानिकी भाषाऽपि वर्तते।भाषायां प्रवाहरूपेण शोधकार्यं भवति वेदानां कथनमधिकृत्य वैज्ञानिकाः नवीनयन्त्राणां निर्माणं कुर्वन्ति। तत्रोपस्थिताः अन्येऽपि विद्वान्सः प्रोÛ ब्रजभूषण ओझा वर्याः प्रोÛ यामिनीभूषणाः प्रोÛ ताराशंकरशर्म महाभागाः विषयोपरि स्वं स्वं विशिष्टं व्याख्यानं प्रस्तुतवन्तः।

27 सितम्बर सोमवार से संस्कृत विभाग डी ए वी पी जी कॉलेज में शास्त्रचतुष्टयी संस्कृत व्याख्यानमाला का भव्य आयोजन किया गया ,जिसमे -वेद व्याकरण साहित्य एवं दर्शन के कुल 15 व्याख्यानों में UGC ( NET ) कोड 25 में निर्धारित विषय वस्तु पर विशेष चर्चा की गई।

दिनांक 20/10/2016 को डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित ‘संस्करात्मकर्मकांडेन सह ज्योतिष-वास्तु कौशल विकास कार्यशाला’ विषयक कार्य शाला का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि प्रोफेसर यदुनाथ दुबे, कुलपति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि ज्योतिष कर्मकांड एवं वास्तु कौशल भारतीय सभ्यता के उन्नति के द्योतक है और हमारी सांस्कृतिक विकास यात्रा को प्रतिबिंबित करते है l वर्तमान समय में इन सब की प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिये l
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर श्री किशोर मिश्र , पूर्व विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति के बीच कर्मकांड और वास्तु कौशल की ज्ञान परंपरा का मेल आवश्यक है ताकि पारंपरिक विद्या के द्वारा हम आधुनिक उन्नति को सतत उन्नतिशील बना सकते है l
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में सारस्वत अतिथि के रूप में पूर्व कुलपति, श्री जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी, उड़ीसा प्रोफेसर गंगाधर पंडा ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय परंपरा में उन्नति के साथ शुभाशुभ का विचार सदैव हावी रहा है इसलिए अतीत की प्राचीन विद्या द्वारा ही कला की नई परंपरा का निर्माण हो सकता है l
इस दस दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो० सत्यदेव सिंह ने कहा कि ज्योतिष कर्मकांड एवं वास्तुशास्त्र जैसे भारत विद्या के प्राचीन स्रोतों को आधुनिक ज्ञान परम्परा में शामिल करके उसका अधिकाधिक रचनात्मक उपयोग इसलिए आवश्यक है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी प्राचीन परंपरा से कटती जा रही है और तरह-तरह की भ्रांतियों की शिकार है l उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य वर्तमान समय में भारत विद्या के महत्व को स्थापित करना है l
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में डॉ पूनम सिंह असिस्टेंट प्रोफेसर संस्कृत विभाग और संयोजक ने आधार वक्तव्य में भारत विद्या के महत्व को स्थापित किया और विभागाध्यक्ष डॉ. लल्लन प्रसाद जायसवाल ने स्वागत वक्तव्य दिया l इस सत्र का सञ्चालन डॉ मिश्री लाल एसोसिएट प्रोफेसर संस्कृत विभाग ने किया और धन्यवाद् प्रकाश नालंदा विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी सदस्या डॉ माधवी तिवारी ने किया l इस अवसर पर सभी विभागों के विभागाध्यक्ष सहित उपाचार्य डॉ अवधेश मिश्र, डॉ शिव बहादुर सिंह , डॉ प्रदीप सेन , डॉ विक्रमादित्य राय, डॉ हरिश्चंद्र यादव, डॉ सत्यगोपाल,डॉ ऋचा यादव,डॉ सर्वेश सिंह, डॉ राकेश दिवेदी , डॉ राकेश राम , डॉ कल्पना सिंह,डॉ मीनू लकड़ा,डॉ अखिलेश दूबे, डॉ मुकेश कुमार सिंह,डॉ शैलजा, डॉ अखिलेन्द्र,डॉ कमालुद्दीन शेख,डॉ समीर पाठक,डॉ हबीबुल्लाह,डॉ सतीश सिंह,डॉ संगीता जैन,डॉ प्रशांत कश्यप, धम्मरतन, शुधान्शु, अंशु यादव,मनीष यादव, सुजीत मौर्या सहित भारी संख्या में छात्र –छात्राएँ उपस्थित थे l
इस दस दिवसीय कार्यशाला में ज्योतिष , कर्मकांड और वास्तु के विभिन्न आयामों पर प्रत्येक दिन विभिन्न विद्वानों द्वारा चर्चा की जाएगी l