दिनांक 26/02/2022 को   प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यानमाला  के अंतर्गत IIT , GANDHINAGAR के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ वी एन प्रभाकर ने “Harappan Bead manufacturing Technology” पर  अपना  विशिष्ट व्याख्यान प्रस्तुत किया I

घोड़े से परिचित थे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग: प्रो पी.पी.जोगलेकर

डी ए वी पी.जी. कॉलेज में चल रहे विशिष्ट व्याख्यान माला प्रधानाचार्य आदरणीय डॉ सत्यदेव सिंह सर की प्रेरणा से अबाध रूप से संचालित हो रही है।प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी ए वी पी जी कॉलेज द्वारा दिनाँक 05/03/2022 को “हड़प्पा सभ्यता में पशु” नामक विषय पर विशिष्ट व्याख्यान प्रो. पी.पी.जोगलेकर द्वारा दिया गया जिसमें उन्होंने सिंधु-सरस्वती सभ्यता से सम्बंधित पशु पक्षियों पर किये गए अपने विशिष्ट कार्य  पर प्रकाश डाला । आज का व्याख्यान प्रो पी पी जोगलेकर ने अपने गुरु आदरणीय प्रो पी के थॉमस को उनके जन्मदिन के अवसर पर समर्पित किया ।इस व्याख्यान में उन्होंने बताया कि 1931 में सर्वप्रथम भारत मे जानवरों की हड्डियों का अध्ययन शुरू हुआ । इसी के साथ सिंधु सरस्वती सभ्यता से संबंधित अनेक पुरास्थलों जैसे बहोला, भीराना, बुर्ज, फरमाना, मसूदपुर, राखीगढ़ी, शिकारपुर,करसोला, कुणाल, रोपड़, कर्णपुरा और कुन्ताशी आदि पुरास्थलों से प्राप्त जानवरो की हड्डियों के अध्ययन से प्राप्त तथ्यों को उद्घाटित किया । प्रो जोगलेकर ने अवगत कराया कि हड़प्पा सभ्यता में वर्तमान समय के लगभग सभी जानवर उपस्थित थे । ये जानवर जंगली व पालतू दोनों प्रकार के थे । इन जानवरों से वे अपने दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करते रहे होंगे। सिंधु सरस्वती सभ्यता के संदर्भ में परिपक्व हड़प्पा के शिकारपुर व कुन्ताशी से प्रो जोगलेकर को अध्ययन के फलस्वरूप घोड़े के साक्ष्य प्राप्त हुए जो भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जो सीमित अवस्था मे उपयोग किये जाते थे।  चर्चा के क्रम में उन्होंने बताया कि बहुत संभव है कि भविष्य में उत्खनन से इस संदर्भ में और प्रकाश पड़े। इसके अतिरिक्त गैंडा के प्रमाण भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो हड़प्पा सभ्यता के अलावा भारत के लगभग सभी क्षेत्रो से उस काल मे प्राप्त होते थे जैसे गंगा घाटी व उड़ीसा आदि। इस कार्यक्रम का संचालन डा मनीषा सिंह जी द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ मुकेश सिंह जी द्वारा किया गया। इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कश्यप, डॉ सीमा और डॉ ओमप्रकाश कुमार उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम  में शिक्षकों , शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया एवं कई बिंदुओं पर प्रो जोगलेकर से चर्चा की।

शैल चित्रकला से उद्घाटित होती है समाजिक जीवन जीने की पद्धति : प्रो वी एच सोनवने

डी ए वी पी.जी. कॉलेज में चल रहे विशिष्ट व्याख्यान माला प्रधानाचार्य आदरणीय डॉ सत्यदेव सिंह सर की प्रेरणा से अबाध रूप से संचालित हो रही है।प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी ए वी पी जी कॉलेज द्वारा दिनाँक 12/03/2022 को “भारतीय शैल चित्रकला की झलक” नामक विषय पर विशिष्ट व्याख्यान प्रो. वी एच सोनवने द्वारा दिया गया जिसमें उन्होंने भारतीय शैल चित्रकला पर किये गए अपने विशिष्ट कार्य  पर प्रकाश डाला । इस व्याख्यान में उन्होंने बताया कि शैल चित्रकला दक्षिण में केरल से उत्तर में लद्दाख के झन्स्कर घाटी और पश्चिम में गुजरात से पूर्व में मणिपुर तक के विस्तृत क्षेत्र में फ़ैले हुए हैं 1इसमे ब्रुज़िन्ग, एन्ग्रविन्ग और पेंटिंग तकनिकी का इस्तेमाल किया गया है और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है I ये चित्रकला ना केवल चट्टानों पर बल्कि शुतुरमुर्ग के अण्डों पर भी इस प्रकार की चित्रकला प्राप्त होती है,  ये चित्रकला निम्न पुराप्रस्तर काल से ऐतिहासिक काल तक प्राप्त हुए हैं, इनसे हमें तत्कालीन समाज की झांकी देखने को मिलती है उद्घाटित किया । इस कार्यक्रम का संचालन डा मुकेश कुमार सिंह द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ ओम प्रकाश कुमार द्वारा किया गया। इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कश्यप, डॉ सीमा और डॉ मनीषा सिंह उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम  में शिक्षकों , शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया एवं कई बिंदुओं पर प्रो सोनावने जी से चर्चा की।

जलवायु के क्रमिक परिवर्तन से हुआ था हड़प्पा सभ्यता के नगरों का पतनडॉ कैमेरान पेट्री

डी ए वी पी.जी. कॉलेज में चल रहे विशिष्ट व्याख्यान माला प्रधानाचार्य आदरणीय डॉ सत्यदेव सिंह सर की प्रेरणा से अबाध रूप से संचालित हो रही है।प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी ए वी पी जी कॉलेज द्वारा दिनाँक 24/03/2022 को “क्या जलवायु परिवर्तन सिंधु नगरीकरण के विनाश का कारक था?” नामक विषय पर विशिष्ट व्याख्यान, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, युनाइटेड किंगडम के ख्यातिलब्ध पुरातत्विद डॉ  कैमेरान पेट्री द्वारा दिया गया l डॉक्टर कैमेरान पेट्री ने बताया कि वैज्ञानिक अध्ययनों से यह प्रमाणित हो चुका है की 2200 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व के मध्य लगभग दो सौ वर्षों तक मानसून भयंकर रूप से बहुत कम हो गया। जलवायु के अचानक परिवर्तन से हड़प्पा के विभिन्न पुरास्थलों का पतन दिखाई देता है।सैटेलाइट इमेज से यह ज्ञात हुआ है कि इसी समय  इस सभ्यता का स्थानांतरण सिंध पाकिस्तान के क्षेत्र से गुजरात, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के क्षेत्रों में हुआ। चर्चा के क्रम में पेट्री ने बताया कि पुरातात्विक स्थलों का संकेद्रण बड़ी नदियों के किनारे न होकर इन नदियों के चैनलों के किनारे था। डॉक्टर पेट्री ने यह निष्कर्ष हरियाणा और राजस्थान के विविध पुरास्थलों जैसे मसूदपुर,लोहारी राघो, डब्ली वास चुगता तथा आलमगीरपुर से प्राप्त किए सैंपल के आधार पर प्रस्तुत किया। इस कार्यक्रम का संचालन डा मनीषा सिंह द्वारा किया गया तथा   स्वागत एवं परिचय डा मुकेश कुमार सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ ओम प्रकाश कुमार ने किया। इस अवसर पर विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रशांत कश्यप, डॉ सीमा उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम  में शिक्षकों , शोधार्थियों व छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया एवं कई बिंदुओं पर कैमेरान पेट्री से चर्चा की

दिनांक २६/०२/२०२० को विभाग के एम ए द्वितीय सेमेस्टर के छात्र-छात्राओं का एक शैक्षणिक भ्रमण उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के सैदपुर भितरी एवं वाराणसी के सारनाथ में हुआ l भितरी में गुप्त कालीन अभिलेख, मूर्तियों, मंदिरों और विहारों के बारे में जानने और समझने का अवसर मिला l इन धरोहरों में गुप्तकालीन शासक स्कंदगुप्त का स्तम्भलेख प्रमुख है जिसमे हूण आक्रमण का उल्लेख मिलता है l सारनाथ के भ्रमण से मौर्यकाल से लेकर बारहवीं शताब्दी तक के पुरावशेषों  के बारे में जानकारी प्राप्त हुई l
इतिहास के विभिन्न कालखंड में वैश्विक महामारी हमेशा से जनमानस के सामाजिक और आर्थिक जीवन को प्रभावित करती रही है l इसके साक्ष्य प्राचीन काल से आधुनिक काल तक मिलते हैं l सैंधव सभ्यता से प्राप्त कुछ बिखरे हुए कंकालों से कैनेडी महोदय जैसे विद्वानों ने मलेरिया या हैज़ा जैसी किसी महामारी को सैंधव सभ्यता के पतन का कारण बताया है l वैदिक काल में तकमा या मलेरिया का उल्लेख आया है l छठी शताब्दी ई.पू. के बौद्ध ग्रंथों में भी कुछ महामारियों की चर्चा मिलती है l मध्य काल एवं आधुनिक काल में भी प्लेग, हैज़ा, चेचक जैसी भयंकर महामारी के प्रकोप के साक्ष्य मिलते हैं l
दिनांक 16/12/2020 को 12:00 बजे अपराह्न प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज, वाराणसी (सम्बद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) द्वारा विभाग के परास्नातकप्रथम वर्ष के नवप्रवेशी छात्र/छात्राओं हेतु एक ऑनलाइन इंडक्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के तौर पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीयइतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर ओमकार नाथ सिंह शामिल हुए और नवप्रवेशी छात्र/ छात्राओं का महत्वपूर्ण दिशानिर्देशन किया।अपने व्याख्यान में प्रोफ़ेसर ओ.एन. सिंह ने प्राचीन इतिहास विषय से होने वाले लाभों की चर्चा की  और इस महत्वपूर्ण विषय को अपने व्यवसाय के रूप में चयन हेतु विद्यार्थियों को जागरुक किया।
अपने विभाग की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से भी नवप्रवेशी छात्र/छात्राओं को रूबरू कराया। आपने बताया कि किस प्रकार विभाग के लोग  अपनी कार्यकुशलता का लोहा देश- विदेश में मनवा रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जैसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संस्था के साथ ही भारत के विभिन्न शीर्ष पदों पर आसीन अपने विभाग से सम्बद्ध लोगों का परिचय भी कराया। विभाग की ओर से होने वाले उत्खनन कार्य मे प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु आमंत्रित करने के साथ ही नवागन्तुकों की विभिन्न प्रकार की शैक्षणिक जिज्ञासाओं का भी समाधान किया।आपने अपने कुशल नेतृव से निरन्तर सफलता के नए प्रतिमान स्थापित करने वाले महाविद्यालय के गौरवशाली इतिहास का निर्माण करने वाले यशस्वी प्राचार्य डॉ. सत्य देव सिंह के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। इस ऑनलाइन इंडक्शन कार्यक्रम का संचालन  विभाग के वरिष्ठ अध्यापक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने किया। स्वागत भाषण विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत कश्यप ने दिया। कार्यक्रम के अंत मे डॉ. ओम प्रकाश कुमार ने सभी का आभार व्यक्त किया तथा डॉ. सीमा ने कार्यक्रम के औपचारिक समापन की घोषणा की। इस अवसर पर विभाग के अन्य सहयोगी अध्यापक डॉ. आशुतोष कुमार सिंह तथा डॉ. शशिकांत सिंह के साथ ही विभाग में प्रवेश लेने वाले नवप्रवेशी छात्र-छात्राएं भी मौजूद रहे।
दिनांक 23/12/2020 को 12:00 बजे अपराह्न प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डी.ए.वी.पी.जी. कॉलेज, वाराणसी (सम्बद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) द्वारा विभाग के छात्र/छात्राओं हेतु एक ऑनलाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के तौर पर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कपकोट, बागेश्वर, उत्तराखण्ड के प्राचार्य और जाने माने पुरातत्वविद प्रोफेसर संतोष कुमार शामिल हुए और छात्र/ छात्राओं को ” प्राचीन भारत की पुरातात्विक संस्कृतियाँ ” विषय पर अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान से लाभान्वित किया। अपने व्याख्यान में प्रोफ़ेसर संतोष कुमार ने भारतीय पुरातत्व में विभिन्न संस्कृतियों विशेषतः पाषाणकालीन संदर्भ में काल निर्धारण व उनकी विशिष्ठताओं पर बड़े लोकप्रिय शैली में प्रकाश डाला। आपने बताया कि किस प्रकार हमारे पूर्वज गेहूँ व आटे से परिचित होकर भी बर्तन न होने के दौर में संभवतः काशी के लोकप्रिय व्यंजन बाटी की तरह खाद्य पदार्थ का उपयोग करते रहे होंगे। साथ ही जिज्ञासुओं की विभिन्न प्रकार की पुरातत्विक जिज्ञासाओं का भी समाधान किया। इस ऑनलाइन कार्यक्रम का संचालन  विभाग के वरिष्ठ अध्यापक डॉ. मुकेश कुमार सिंह ने किया। स्वागत भाषण विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत कश्यप ने दिया। कार्यक्रम के अंत मे डॉ. ओम प्रकाश कुमार ने महाविद्यालय के यशस्वी प्राचार्य डॉ. सत्य देव सिंह समेत कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विभाग के अन्य सहयोगी अध्यापक डॉ. सीमा, डॉ. आशुतोष कुमार सिंह तथा डॉ. शशिकांत सिंह के साथ ही विभाग में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं भी  मौजूद रहे।
अखिल भारतीय  इतिहास संकलन योजना काशी प्रान्त और डी ए वी पी जी कॉलेज प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के तत्वावधान में आयोजित इतिहास दिवस कार्यक्रम में मुख्या वक्त डॉ प्रशांत कश्यप ने बताया की काशी राजधानी वाला गहड़वाल राजवंश अंतिम हिंदू राजवंश था जिन्होंने १०९८-११९६ ईस्वी तक राज्य किया जिन्होंने काशी में राजघाट स्थित आदिकेशव मंदिर, कंदवा, कर्दमेश्वर मंदिर, भदैनी स्थित लोलार कुंड निर्माण कराया l
मुख्य वक्ता ने बताया कि वर्त्तमान भूमंडलीकरण के दौर में पुरातत्व विषय एक बहुत ही महत्वपूर्ण एवं रोजगारपरक विषय है l इस विषय की वर्तमान समय में बहुत मांग है l  इस विषय का अध्ययन करने के उपरांत विद्यार्थी म्युज़ियम क्यूरेटर, सहायक पुरातत्वविद एवं शिक्षा के क्षेत्र में जा सकते हैं l

मुख्य वक्ता  ने बताया कि प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में मुद्राएं अत्यंत उपयोगी साधन हैं l मुद्राओं से किसी साम्राज्य की धार्मिक, सामाजिक,आर्थिक, सांस्कृतिक उपलब्धियों, शासक की व्यक्तिगत रूचि आदि का पता चलता है l